बी.एड. के प्रशिक्षणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर एक अध्ययन
डाॅ. कमल नारायण गजपाल1, रंजन कुमार चैबे2
1विभागाध्यक्ष, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर
2एम. एड. छात्र, प्रगति महाविद्यालय, रायपुर
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
जीवन में सफलता का आधार वास्तव में शिक्षा में निहित है। समय के साथ-साथ शिक्षा के उद्देश्य भी बदलते रहते हैं। स्वतंत्रयोत्त्र भारत में शिक्षा को सामाजिकरण का समस्त साधन मानते हुए इसके द्वारा वैयक्तिकता व नागरिकता के गुणों को विकसित करने का प्रयत्न किया गया।आज कल हम शिक्षा को व्यवसायोन्मुख करने का प्रयत्न कर रहे है। शिक्षा द्वारा विकल्पों में से उत्तम को चुनने की कुशलता विकसित होनी चाहिए। आज हम पूर्णतः स्वतंत्र रहकर अपने हित को सर्वोपरि रखकर प्रायः विकल्प चुना करते है। परन्तु वास्तव में होना नहीं चाहिए। स्वतंत्रता का आशय यह नहीं है कि चुनाव के समय हम देश हित या सामाजिक हित पर ध्यान नहीं दे। पूरी शिक्षा वास्तव में मूल्य निर्धारण की ही प्रक्रिया है। भारतीय नागरिकों में शिक्षा द्वारा विकसित किये जाने वाले मूल्यों के बारे में हमारे शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों व अभिभावकों में आज तक मतैक्य नहीं है। जीवन एक वास्तविक सत्य है जिसमें शिक्षक शब्द की शिक्षा व्यवस्था का सूत्रधार है। किसी भी देश का परिचय वहाँ की संस्कृति सभ्यता एवं नागरिकों के निर्माण में प्रमुख भूमिका शिक्षक की ही होती है। शिक्षक की महत्ता पड़ प्रकाश डालने से पता चलता है।शिक्षा देश की बुनियादी है और शिक्षक राष्ट्र निर्माता। शिक्षक वह महान विभूति है, जो ज्योति पुुंज है, जो स्वयं जलकर शिक्षा को आध्यात्मिक का अधिष्ठान देता हैं शिक्षक हृदय परिवर्तन करते है। दिशा परिवर्तन के लिए दिशा खोजते हैं।
KEYWORDS: प्रशिक्षणार्थियों, मानवाधिकार, जागरूकता, अध्ययन
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शिक्षा का दायित्व सरकार का होता है, परन्तु समाज में तेजी से बढ़ती जनसंख्या के कारण शिक्षा आवश्यकता को पूर्ण करने में केन्द्र एक राज्य स्तरों पर अब तक गठित हमारे यहाँ के सभी शिक्षा आयोग तथा शिक्षा समितियों ने ऐसा गुणवत्ता पूर्ण अध्यापक शिक्षा पर बल दिया है। जो शिक्षा व्यवस्था को पूरा कर सके। शिक्षक के संबंध में कहा गया है कि इंजीनियर की त्रृटि से कुछ भवन और पुल टूट सकते है, एक डाॅक्टर के त्रुटि से कुछ मरीज मर सकते है, परन्तु एक शिक्षक की त्रुटि संपूर्ण राष्ट्र को हानि होती है। आज के समय में शिक्षा, शिक्षक विद्यार्थी प्रमुख है। परन्तु शिक्षा के बिना पूरा सब कुछ अधुरा हैं। ‘शिक्षा देश की रोशनी है। ’’शोधकार्य द्वारा छत्तीसगढ़ के बी. एड. महाविद्यालय के प्रशिक्षणार्थियों का चयन किया गया है। जिसमें शोधकत्र्ता ने रायपुर जिले के अशासकीय महाविद्यालय के विद्यार्थियों के संयोजिक मानवाधिकार का अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।
मानवाधिकर:-
मानव अधिकर आयोग के समानांतर संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्देशों तथा हमारी संस्कृति के आदर्श ‘‘वसुर्धव कुटुम्बकम्’’ को सिद्धांत से व्यवहार में लाने के लिए, अस्पृश्यता समाप्त करने एवं दलितों को अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने कई कानूनी प्रयास किए है, संविधान के अनुच्छेद 17 में अपराध अधिनियम 1955 के रूप में पुर्ननिर्मित किया गया है। दलित वर्ग के प्रति अपराध को रोकने तथा निवारण के लिए 30 जनवरी 1990 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 लागू किया गया है, साथ ही बालरम अधिनियम 1986, बालक अधिनियम 1960, राष्ट्रीय आयोग महिला अधिनियम 1990, अल्पसंख्यक अधिनियम 1992 जैसे कई विधि कानून परित किये गये हैं।
मानवाधिकर का अर्थ -
‘‘सभी व्यक्तियों को समानता से जीवन जीने का अधिकार प्राप्त हो सके और सभ्य समाज में मानवीय मूल्यों की उत्तरोत्तर पाप्ति हो सके।’’
मानव अधिकार की परिभाषा:-
डब्ल्यू, रिचडर््स के अनुसार:-‘
मानव अधिकार वे न्यूनतम आवश्यकताएँ है, जिनकी मांग अधिकार स्वरूप होनी चाहिए तथा जिनके अभाव में कोई भी मानव अपनी क्षमता को विकसित नहीं कर सकता है और न ही मानव की भाँति जीवन व्यतीत कर सकता है।’’
भारतीय संविधान में मानव अधिकार का संरक्षण:-
विकसित प्रजातांत्रिक युग में भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। भारत का संविधान जब पारित हुआ। त्तकालीन समय में विश्व स्तर पर मानवाधिकारों को लेकर चर्चा प्रारंभ हो चुकी थी। भारतीय संविधान में भी नागरिकों को ‘‘मूल अधिकारों’’ के रूप में इन्हें भाग 3 में वणित किया गया।
मानव अधिकार की विशेषताएँ -
ऽ मानववाद इस विश्व को किसी के द्वारा निर्मित नहीं मानता। इसके अनुसार इसको किसी ने नहीं बनाया अपितु इसका अस्तित्व तो स्वतः ही है।
ऽ मानवाधिकार के अनुसार यह विश्व भ्रम नहीं है, अपितु सत्य है। यह परिवर्तनशील है और निरन्तर विकासशील है।
ऽ मानववाद के अनुसार मानव इस सृष्टि का अंग है और सृष्टि के विकास की प्रक्रिया का परिणाम है। मानव इस विश्व की सृजनात्मक शक्तियों का उच्चतम फल है, जिसके ऊपर और कुछ नहीं है, केवल आकांक्षायें है।
ऽ विज्ञान ने मानव कल्याण में सहयोग दिया है, इसलिए मानववाद विज्ञान के महत्व को स्वीकार करता है। यह विचारधारा आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों और वैज्ञानिक विधि को मानव हित के लिये उपयोगी मानती है।
ऽ मानववाद में मानव के महत्व पर अत्यधिक बल दिया गया है। मानव का इस सृष्टि का सबसे सुन्दर जीव बतलाया गया है। मानव में रचनात्मकता का गुण विद्यमान हैं।
ऽ मानववाद में मानव को न मतो केवल एक यन्त्र और मशीन माना गया हैं और न ही कवल एक जीव माना गया है, अपितु उसे असीम संभावनाओं से युक्त माना गया है।
ऽ मानववाद के अनुसार सत्य, शिव, सुन्दरम् के आदर्श को प्राप्त करना मानव का लक्ष्य होना चाहिए।
ऽ मानववाद दर्शन, विज्ञान, कला और साहित्य के माध्यम से जीवन के नैतिक एंव आध्यत्मिक मूल्यों की खोज करने का प्रयत्न करना है।
भारत में मानव अधिकार आयोग:-
भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की तृतीय समिति के समक्ष मानव अधिकारों की अभिवृद्धि एवं संरक्षण हेतु एक राष्ट्रीय संस्था स्थापित करने में रूचि दिखाई थी। भारत में एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा जिलों में मानवाधिकार न्यायालयों की स्थापना की गई।
भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार:-
ऽ समानता का अधिकार जो संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में दिया गया है।
ऽ कई प्रकार की स्वतंत्रताओं का अधिकार जिसका प्रावधान अनुच्छेद 19वें में है।
ऽ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार जिसका प्रावधान अनुच्छेद 29, 21 एवं 22 में है।
ऽ शोषण के खिलाफ अधिकार जो अनुच्छेद 223 और 24 में है।
ऽ किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता का अधिकार जिनका प्रावधान अनुच्छेद 25 और 28 में हैं।
ऽ शिक्षा और संस्कृति का अधिकार जिनका उल्लेख अनुच्छेद 29 और 30 में है।
ऽ अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार अनुच्छेद 22 में है।
मानव अधिकार एवं शिक्षा संबंधी अनुच्छेद 26- मानव अधिकार के सार्वभौमिक घोषणा-1948ः
ऽ प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है। शिक्षा कम से कम प्रारंभिक और बुनियादी अवस्थाओं में निःशुल्क होगी। प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य होगी। तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा सभी को योग्यता के आधार पर समान रूप से उपलब्ध होगी।
ऽ शिक्षा का उद्देश्य होगा मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास और मानव अधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की पुष्टि। शिक्षा द्वारा राष्ट्रों, जातियों अथवा धार्मिक समूहों के मध्य आपसी सद्भावना, सहिष्णुता, मैत्री का विकास होगा और शांति व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रयत्नों को आगे बढ़ाया जाए।
ऽ माता-पिता को सबसे पहले इस बात का अधिकार है कि वे चुनाव कर सकें कि किसी की शिक्षा उनके बच्चों को दी जाएगी। मानव अधिकार शिक्षा, संस्कृति, पाठ्यक्रम, राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा में मानव अधिकार तथा पाठ्यर्चा के महत्व को दर्शाते है।
मानव अधिकार एवं राष्ट्रीय नीति 1196:-
पिछले कुछ वर्षों से ‘‘मानवाधिकार शिक्षा’’ शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्यों का अभिन्न बनी हुई है। यह विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा (एन.सी.ई.आर.टी.) व दूसरे क्रियाकलापों के माध्यम से दृष्टिगोचर हो रही है। स्वतंत्रता के पश्चात् शिक्षा प्रणाली के पुर्नठन हेतु विभिन्न आयोग एवं समितियाँ गठित की गई जिनमें मानवाधिकार शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। साथ ही नई प्रणाली शिक्षा नीति 1986 के संशोधत स्वरूप में 1992 में भी इस पर बल दिया गया है। नई शिक्षा नीति 1986 में वर्णित मानवाधिकार संबंधी तथ्य निम्न हैं।
‘‘भारतीय शिक्षा व्यवस्था का मूल मंत्र यह है कि एक निश्चित स्तर तक हर विद्यार्थी को बिना जात-पात, धर्म या लैंगिक भेद के लगभग एक जैसी अच्छी शिक्षा उपलब्ध हो। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए शासन उपयुक्त रूप से वित्त घोषित कार्यक्रमों की शुरूआत करेगा।’’
महाविद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा एवं मानवाधिकार:-
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की सिफारिशों को लागू करने के लिए मानवाधिकार से संबंधित कई घटकों को शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर अपनाया जा रहा है। एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा प्रकाशित विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा 2000 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 द्वारा चिन्हित दस केन्द्रिक घटकों को स्कूली पाठ्यक्रम में एकीकरण करने की बात कहीं गयी हैं।
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ये केन्द्रिक घटक किसी न किसी रूप में मानव अधिकारों से जुड़े हुए है। पाठ्यचर्चा ने समाज के सभी वर्ग के बच्चों के लिए जिनमें सुविधाहीन और वंचित वर्ग के बच्चें, कामकाजी बच्चे व लड़कियाँ शामिल है, समतुल्य शिक्षा देने की बात पर जोर दिया गया। 2008 में एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा पुनः तैयार की गयी है। इस दस्तावेज में सामजिक न्याय और समान्ता के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष, समता मूलक और बहुलतावादी समाज के आदर्श से प्रेरणा लेते हुए शिक्षा के व्यापक उद्देश्य चिन्हित किये गये हैं। यह दस्तावेज भी मानव अधिकार संबंधी मुद्दों को पाठ्यक्रम के साथ जोड़ने की बात पर जोर देता है, चाहे वे मुद्दे समानता के हो, लैंगिक हो, पर्यावरण, शिक्षा अथवा स्वास्थ्य संबंधी हो। यह दस्तावेज लिखता है कि:-‘‘मानवाधिकार की अवधारणा का संदर्भ सार्वभौमिक मूल्यों से और ऐसे तरीकों से परिचित कराया जाए जो उनकी उम्र के अनुकूल हो। रोजमर्रा के मुद्दों के संदर्भ जैसे - पानी की समस्या आदि की भी चर्चा की जा सकती है ताकि बच्चे मानव सम्मान और अधिकारों के प्रति जगरूक बन सकें।’ (राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा, 2005 पृष्ठ 59) यह दस्तावेज पुनः लिखता है कि मानव अधिकार शांति की अवधारणा को केन्द्रीय आधार है। अगर लोगों के अधिकारों का हनन हो तो शांति का वातावरण नहीं बन सकता। अतः शांति स्थापित करने के लिए श्ज्ञिक्षा द्वारा बच्चों को मानव अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जरूरत है। इस प्रकार मानव अधिकार को सभी विषयों तथा पाठ्य सहगामी क्रियाओं में समाहित किया जाना चाहिए।
महाविद्यालय में मानवाधिकार शिक्षा निम्न प्रकार से दी सकती है:-
ऽ महाविद्यालय स्तर पर सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे - कविता, निबंध, वाद-विवाद, झाँकियाँ आदि कई प्रतियोगिताओं का आयोजन कर मानव अधिकारों की जानकारी दी जा सकती है।
ऽ महाविद्यालय नुक्कड़, नाटकों का आयोजन करके जानकारी प्रस्तुत कर सकते हैं।
ऽ महाविद्यालय परिसीमा में मानव अधिकार कार्नर की स्थापना करके जिससे मानव अधिकर व बाल अधिकार की जानकारी राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों के हनन की घटनाअें तथा मानव अधिकार आयोग द्वारा दी गई कार्यवाही का उल्लेख हो। ताकि मानव अधिकार के हनन तथा आयोग द्वारा की गई कार्यवाही की जानकारी प्राप्त हो सकें। जानकारी प्राप्त होने से बचा सकेंगे।
ऽ माध्यमिक एवं उच्चतर माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को सत्र में गतिविधियाँ आयोजित करके जैसे- आसपास के ग्रामीण क्षेत्र में मानव अधिकार के हनन से संबंधित प्रकरण को एकत्रित करके उचित माध्यम द्वारा उन्हें हल कराने का प्रयास किया जाना।
ऽ महाविद्यालय में प्रतिवर्ष 10 दिसम्बर को मानवाधिकार दिवस पर वाद-विवाद, निबंध, प्रदर्शनी, चित्रकला, भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन कर प्रतिभागियों को पुरस्कृति किया जा सकता है।
ऽ महाविद्यालय द्वारा जो पत्रिका प्रकाशित की जाती है। उसमें मानव अधिकारों के हनन व आयोग के कार्यो के बारे में जानकारी दी जा सकती हैं। संबंधित विद्यार्थियों तथा अध्यापकों के विचारों का भी प्रकाशित किया जा सकता है।
ऽ महाविद्यालय द्वारा अध्यापकों व विद्यार्थियों से संकल्प पत्र भरवाए। जाए कि महाविद्यालय में गठित अधिकार शिक्षा प्रकोष्ठ की स्थापना के साथ मानव अधिकार शिक्षा के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। 10 दिसम्बर, मानव अधिकर दिवस पर मानव अधिकार सप्ताह घोषित कर पूरे सप्ताह में जनसाधारण को जगरूक बनाने हेतु पम्पलेट, पोस्टर, नाटक, प्रभात-फेरियाँ आादि के माध्यम से जनचेतना तथा जनसहयोग द्वारा यह अभियान सार्थक किया जा सकता है।
अध्ययन का महत्व:-
बालकों को शिक्षित करने का कार्य माता-पिता, समाज एवं शिक्षक करते है। अतः शिक्षक को उच्च चरित्र, उच्च बुद्धि एवं उच्च गुणवत्ता होना अति आवश्यक है। शिक्षक इन सभी गुणों को अर्जित कर एवं प्रशिक्षण प्राप्त कर एक उत्तम शिक्षक बनते है। शिक्षक को बुद्धि के साथ-साथ सामान्य बुद्धि एवं सांवेगिक बुद्धि का होना आवश्यक है। जिसके द्वारा शिक्षक, बालकों में सांवेगिक नियंत्रण एवं सांवेगिक परिपक्वता का निर्माण कर सकते है। जब शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त करते है तो उनहें बहुत सी कसौटियों में खरा उतारा जाता है। बहुत से शिक्षकीय कार्यों एवं अध्ययन अध्यापन संबंधित कार्यों को कराया जाता है। जिससे वे अच्छे शिक्षक बन सके। इस प्रकार इन कार्यों को करने से उनके मानवाधिकार के प्रति जागरूकता में सार्थक सह-संबंध पाया जाना स्वाभाविक है। यह सह-संबंध अलग-अलग होता है।
शोधकत्र्ता ने मानवाधिकार के प्रति जागरूकता ज्ञात करने का प्रयास किया है तथा इसी समस्या को देखते हुए निम्न शीर्षक पर शोध करने का लघु प्रयास किया गया है। ‘‘बी. एड. के प्रशिक्षणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर एक अध्ययन।’’ किया गया है। मानवाधिकार के अनुसार मनुष्य एवंसमाज के जीवन में शिक्षा का अत्यन्त महत्व स्थान है। शिक्षा आदर्श समाज की स्थापना का साधन है। शिक्षा एक सृजनात्मक प्रक्रिया, शिक्षा की मानवीय प्रेम की भावना उत्पन्न करने का दायित्व है। शिक्षा के द्वारा विश्व बन्धुता की भावना का विकस किया जा सकता है।अतः शिक्षा का लक्ष्य मानव की आवश्यकताओं और रूचियों के अनुरूप होनी चािहए। शिक्षा से ही बालक का व्यक्तित्व का विकास होता है। इस प्रकार मानवाधिकार शिक्षा मानव केन्द्रित है।
संबंधित शोध साहित्य का अध्ययन:-
विभिन्न शोधकर्ताओं द्वारा जो अध्ययन किया गया हैं, उन ज्ञानकोषों की संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास किया गया हैं, जो अग्रांकित हैं -
भारत में किए गए शोध अध्ययन:-
लेमन:- ‘‘समग्र मानवाधिकार के कल्याण के लिए मानवाधिकार सेवा का दर्शन है, इसका विश्वास है कि मानव का कल्याण तर्क, बुद्धि तथा लोकतंत्र द्वारा संभव है।’’भारत सरकार ने 22 अगस्त 1974 को एक संकल्प के साथ बच्चों की भलाई के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाई। जो महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित है। बच्चों की देखभाल और उचित विकास के लिए चिंता करना पूरे राष्ट्र का उत्तरदायित्व है। शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए पर्याप्त सेवायें देना राष्ट्र की नीति होगी।बच्चों की शिक्षा, गरीब बच्चों की देखभाल, विकलांग बच्चों की देखभाल को प्राथमिकता।बच्चों की भालई से संबंधित कार्यक्रमों के विकास के लिए, विभिन्न संगठनों संस्थाओं से हर समय सहायता देना। मानव अधिकार मस्तिष्त की अभिवृत्ति है, जो मानव और उसकी शक्तियों, मामलों, लौकिक आकांक्षाओं तथा उसकी भलाई को प्राथमिक महत्व प्रदान करता है। मानवाधिकार के अनुसार मानव इस सृष्टि का एक अंग है और सृष्टि का विकास की प्रक्रिया का परिणाम है।सत्य, शिव, सुन्दरम् के आदर्श को प्राप्त करना मानव का लक्ष्य होना चाहिए। विज्ञान, दर्शन एवं कला तथा साहित्य के माध्यम से जीवन के नैतिक मूल्यों की खोज करना। मानवाधिकार का लक्ष्य संतुलित एवं पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना। विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार-संरक्षण एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम-1995ः- ‘‘विकलांगता से ग्रस्त उसे 18 वर्ष के प्रत्येक बालक की निःशुल्क शिक्षा एवं शैक्षिक उपकरणों तक पहुँचा उपकरणों तक पहुँच होनी चाहिए।’’
भासकराचार्ययूनू, डाॅ. (2003) - ने शिक्षा के अधिकार एवं मानवाधिकार शिक्षा में अध्ययन किया। लेखक कहते है कि मानवाधिकार गतिज प्रत्यय है जो भाव को विस्तारित रूप से फेलता है एवं स्थिर करता है। उच्च स्तर के विकास के लिए मानव समाज के नये क्षेत्र को भी पूरा करता है।
ए. सूहाशिनी (2003) - ने मानवाधिकार एवं कर्तव्य शिक्षा पर अध्ययन किया और निष्कर्ष पाया सुसंगत एवं व्यवस्थित एवं स्वास्थ्य समाज को लाना शिक्षा का कार्य है। लेखक ने अवलोकन किया कि व्यक्ति को उनके अधिकार एवं कर्तव्य के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है।
विदेशों में किए गए शोध अध्ययन:-
यूनेस्कों की मानवाधिकारों एवं प्रजातंत्र संबंधी -‘‘अंतराष्ट्रीय कांग्रेस’’ ने मार्च 1993 में कहा -‘‘मानवाधिकारों की रक्षा स्वयं में एक मानवाधिकार है, जो सम्यक विकास, सभ्य समाज और लोकतंत्र की एक पूर्वावश्यकता है।’’
सलामांका स्अेटमेंट 1994:- ‘‘विशिष्ट आवश्यकता वाले बालकों की पहुँच नियमित विद्यालयों तक होनी चाहिए, जहाँ बाल-केन्द्रित शिक्षा विज्ञान के साथ उनकी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।’’
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा (1995-2004) के दशक को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार शिक्षा दशक घोषित किया गया था। त्तकालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने ठीक ही कहा था।‘‘शिक्षा के बिना हम एवं अपने संकीर्ण परिवेश से बाहर आकर वैश्विक अंतनिर्भरता का वास्तविकता का साक्षात्कार नहीं कर सकते। शिक्षा के अभाव में हम मानवीय लक्ष्यों और आकांक्षाओं की पहचान भी नहीं कर सकते।’’
अमेरिकी गैर सरकारी संस्था की 2004 की रिपोर्ट बनाती है कि:- ‘‘भारत विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है और यहाँ स्वतंत्र प्रेस और सामाजिक संस्थाएँ है, फिर भी कुछ बाते है, जिनमें मानव अधिकारों की सुरक्षा नहीं होती।’’
बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (अनुच्छेद 23):- ‘‘मानसिक अथवा शारीरिक रूप से विकलांग बालक वैसी दशाओं में एक पूर्ण और सम्मानजनक जीवन का आनंद ले सकता है। जो उसके महत्व को सुनिश्चित करते है। आत्मनिर्भरता को बढ़ाते है, तथा समुदाय में उनकी सक्रिय भागीदारी को बढ़ाते हैं।’’
बलार्ड. डाॅ (2001):-
मानवाधिकार एवं इंडोनेशिया के खनन क्षेत्र एक आधारभूत अध्ययन में शोधकर्ता ने इंडोनेशिया के खदान में काम करने वाले व्यक्तियों के मुख्य मानव अधिकार का विश्लेषण किया एवं कल-कारखानों के ऐसे क्षेत्रों का पता लगाया जिससे विकास किया जा सके।
नींद. डाॅ मिलानी (2006) ‘‘छात्रों के साथ विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता विभिन्न कक्षा विषय में शिक्षाशास्त्र के प्रयोग’’ में निष्कर्ष पाया कि शिक्षक छात्रों की विशिष्ट शैक्षिक आवश्यकता में प्रभावी रूप से कार्य करते है। इस अध्ययन ने शिक्षण उपागम के गुणों का शैक्षिक सजगता, सामाजिक संलग्नता एवं व्यवहार कुशलता पर प्रभाव देखा गया और चर्चा की गई। समूह अंतःक्रिया शिक्षक को सीखने में किस तरह सहायक है।
अध्ययन का उद्देश्य:-
शोधकर्ता द्वारा चुनी गई समस्या के लिए अध्ययन का उद्देश्य निम्नलिखित है।
1. बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।
2. बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना।
3. बी. एड. के महिला प्रशिक्षाणार्थियों में मानवाधिकार के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।
4. बी. एड. के पुरूष प्रशिक्षाणार्थियों में मानवाधिकार के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना।
अध्ययन की परिकल्पना:-
प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाओं का निर्माण किया है -
1. परिकल्पना भ्1 - बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
2. परिकल्पना भ्2 - बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर पड़ने वाले प्रभाव में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
3. परिकल्पना भ्3 - बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के महिला के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
4. परिकल्पना भ्4 - बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के पुरूष के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया जायेगा।
अध्ययन की परिसीमन:-
प्रस्तुत लघु शोध समस्या के अध्ययन के लिए षोधकर्ता ने निम्नलिखित परिसीमाओं का निर्माण किया है -
1. प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर जिले का चयन किया गया है।
2. प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर जिले के अंतर्गत रायपुंर शहर का चयन किया गया है।
3. प्रस्तुत अध्ययन हेतु रायपुर के शहरी क्षेत्र के 05 अशासकीय महाविद्यालयों का चयन किया गया है।
4. प्रस्तुत अध्ययन बी. एड. प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे प्रशिक्षणार्थियों के मानवाधिकर के प्रति जागरूकता तक सीमित है।
5. प्रस्तुत अध्ययन में बी. एड. प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे छात्र एवं छात्राओं दोनों का चयन किया गया है।
6. प्रस्तुत अध्ययन के अंतर्गत 100 बी. एड. प्रशिक्षणार्थियों की स्थिति के संबंध में जानकारी प्राप्त की जायेगी।
7. प्रस्तुत अध्ययन के लिये शोध की सर्वे विधि का प्रयोग किया गया है।
8. इस अध्ययन हेतु ‘‘डाॅ. विशाल सूद एवं आरती आनंद’’ द्वारा निर्मित प्रमाणित परीक्षण का प्रयोग किया गया है।
षोध प्रविधि:-
प्रस्तुत लघुशोध प्रबंध की समस्या के अध्ययन के लिए षोधकर्ता द्वारा सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है ।
1.1. जनसंख्या:-
प्रस्तुत अध्ययन में शोध द्वारा बी. एड. के प्रशिक्षणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर एक अध्ययन किया गया है और इस अध्ययन के लिये जनसंख्या के लिये रायपुर शहर में स्थित 05 अशासकीय महाविद्यालयों का चयन किया गया है तथा इन महाविद्यालयों में अध्ययनरत् प्रशिक्षणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर एक अध्ययन किया गया है। जिसमें जनसंख्या के लिए अशासकीय महाविद्यालयों में अध्ययनरत् कुल 357 प्रशिक्षणार्थियों को शामिल किया गया है।
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1.2. न्यादर्श विधि:-
न्यादर्श का आकार हमारे अध्ययन की प्रकृति पर निर्भर करता है। यदि न्यादर्श पर्याप्त है तो शुद्धता अधिक होगी। न्यादर्श योजना बनाते समय एक न्यादर्श संरचना तैयार करना पड़ता है। इसके लिये इकाईयों की सुची तैयार की जा सकती है, इसे न्यादर्श संरचना कहते है। न्यादर्श के आदर्श विधियों द्वारा की एक शोधकत्र्ता अच्छी शोध विधि पद सदा उतरता है। प्रस्तुत लघुशोध कार्य में समस्या के समाधान हेतु न्यादर्श का चयन रायपुर जिले के 05 अशासकीय महाविद्यालयों में अध्ययनरत् 100 बी.एड.प्रशिक्षणार्थियों का चयन यादृच्छिक प्रतिदर्ष विधि से किया गया है। जिसके अन्तर्गत समस्या के समाधान हेतु 100 बी.एड.प्रशिक्षणार्थियों का न्यादर्ष हेतु चयन किया है। इनमें से प्राप्त परिणाम समग्र का पूर्णतः प्रतिनिधित्व करेगंे।
उपरोक्त सारणी क्रमांक 1.2 में दर्शाये गये बी.एड.प्रशिक्षणार्थियों की संख्या में से प्रत्येक महाविद्यालयों से 10 पुरूष एवं 10 महिला बी.एड. प्रशिक्षणार्थियों का चयन किया गया है। जिसमें अशासकीय महाविद्यालयों के कुल 357 बी.एड. प्रशिक्षणार्थियों में से समस्या समाधान हेतु शोधकर्ता ने 100 बी.एड.प्रशिक्षणार्थियों का चयन किया गया है और जिनमें 50 पुरूष तथा 50 महिला बी.एड.प्रशिक्षणार्थि है।
उपकरण:-
प्रस्तुत लघुशोध में डाॅ. विशाल सूद एवं आरती आनन्द द्वारा निर्मित मानवाधिकार के प्रति जागरूकता उपकरण का प्रयोग किया गया।
सांख्यिकीय विश्लेषण:-
अनुसंधान प्रक्रम में प्राप्त आंकड़ों के वर्गीकरण व व्यवस्थापन के पश्चात् विभिन्न सांख्यिकीय मापों के गहनता की आवश्यकता पड़ती है। परीक्षण से प्राप्त प्राप्तांकों के आधार पर सार्थकता मान ज्ञात करने के लिए सांख्यिकीय मानों का प्रयोग किया जाता है। जिसमें मध्यमान, विचलन एवं टी मूल्य की गणना की गई है तथा संबंध ज्ञात करने के लिए सह-संबंध गुणांक द्वारा सार्थकता स्तर ज्ञात किया जाता है। इसे प्राप्त करने के लिए निम्न सूत्रों का प्रयोग किया गया है:-
1. मध्यमान
ड त्र मध्यमान
त्र योग
छ त्र प्राप्तांकों की संख्या
2. प्रमाणिक विचलन -
त्र प्रामाणिक विचलन
त्र समान्तर मध्यमानों से प्राप्त किये गये विचलनों की संख्या
छ त्र प्राप्तांकों की संख्या
3. प्रमाणिक विचलन पुल्ड -
त्र प्रामाणिक विचलन पुल्ड
त्र एक परीक्षण से प्राप्त विचलनों का वर्ग
त्र दूसरे परीक्षण से प्राप्त विचलनों का वर्ग
छ1 त्र एक परीक्षण की संख्या
छ2 त्र दूसरे परीक्षण की संख्या
4. प्रमाणिक विचलन त्रुटि -
त्र प्रामाणिक विचलन त्रुटि
त्र प्रामाणिक विचलन पुल्ड
त्र प्रथम एवं द्वितीय परीक्षण की कुल संख्याओं का योग
त्र प्रथम एवं द्वितीय परीक्षण की कुल संख्याओं का गुणनफल
5. सार्थक अंतर या टी मूल्य -
त्र प्रामाणिक विचलन त्रुटि
त्र सार्थक अंतर
त्र प्रथम परीक्षण का मध्यमान
त्र द्वितीय परीक्षण का मध्यमान
6. स्वतंत्रता कोटि -
त्र स्वतंत्रता कोटि
छ1 त्र पहले समूह के न्यादर्श का आकार
छ2 त्र दूसरे समूह के न्यादर्श का आकार
निष्कर्ष:-
1. परिकल्पना भ्1 - बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियां के लिंग के आधार पर पुरूष का मध्यमान 59.84 तथा महिला का मध्यमान 58.66 एवं पुरूषों का प्रमाणिक विचलन 14.97 है एवं महिला का प्रमाणिक विचलन 10.95 पाया गया। दोनो समूहों का टी मूल्य 0.48 आया। टी मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटी क ित्र 98 के स्तम्भ में टी का मान देखने पर 0.05 स्तर पर सार्थक अंतर नहीं है। अतः परिकल्पना स्वीकृत है।
2. परिकल्पना भ्2 बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर पड़ने वाले प्रभाव के विषय के आधार पर विज्ञान पुरूष का मध्यमान 63.16 तथा प्रमाणिक विचलन 15.33 है एवं विज्ञान महिला का मध्यमान 56.96 तथा प्रमाणिक विचलन 10.05 पाया गया। दोनो समूहों का टी मूल्य 1.57 आया। टी मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटी क ित्र 48 के स्तम्भ में टी का मान देखने पर 0.05 स्तर पर सार्थक अंतर नहीं पाया जाएगा। अतः बी. एड. के विज्ञान पुरूष तथा बी. एड. के विज्ञान महिला के मानवाधिकार के प्रति जागरूकता पर पड़ने वाले प्रभाव में कोई सार्थक अंतर नहीं पाया जाएगा। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती है।
3. परिकल्पना भ्3 - बी. एड. प्रशिक्षाणार्थियों के विज्ञान के पुरूष का मध्यमान 63.16 तथा प्रमाणिक विचलन 15.33 है एवं बी. एड. के कला के पुरूष का मध्यमान 56.52 तथा प्रमाणिक विचलन 13.82 है पाया गया। दोनो समूहों का टी मूल्य 1.61 आया। टी मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटी क ित्र 48 के स्तम्भ में टी का मान देखने पर 0.05 स्तर पर सार्थक अंतर नहीं पाया जाएगा। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत होती है।
4. परिकल्पना भ्4 - बी. एड. के विज्ञान के महिला एवं कला के महिला के आधार पर किया गया। विज्ञान महिला का मध्यमान 56.96 तथा प्रमाणिक विचलन 10.05 इसी प्रकार कला के महिला का मध्यमान 60.36 तथा प्रमाणिक विचलन 11.54 पाया गया। दोनो समूहों का टी मूल्य 1.11 आया। टी मूल्य की सार्थकता ज्ञात करने के लिए स्वतंत्रता कोटी क ित्र 48 के स्तम्भ में टी का मान देखने पर 0.05 स्तर पर सार्थक अंतर नहीं पाया गया। अतः यह परिकल्पना स्वीकृत है।
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Received on 05.10.2020 Modified on 23.10.2020
Accepted on 19.11.2020 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):242-250.